Wednesday, October 27, 2010

Sukuun

आज कोई सुकून ख़ास हैं !
बेवजह कोई ख़ुशी का एहसास हैं !
धीमे गुजरते वक़्त में नजाने क्यों,
कोई अंजानी सी महक - ख़ास हैं !

ख़ुशी को ढूंडनेमें लगा था शायद कही,
कहा ऊपर वाले से - कोई तलाश हैं कही,
वोह लौ हवा के झोके से कुछ य़ू हिला,
और मन में ख्याल आया
सुकून की तलाश हैं शायद कही !

सुकून देने वाली जगह सोच रहा था !
वोह शांत, निशाब्ध वातावरण सोच रहा था !
वोह खामोश प्रतिवेश और परियावरण सोच रहा था !
फिर समाज आई,
सुकून तो अभी यहाँ भी हैं !
इन वाहनों के ध्वनि के बिच भी हैं !
सुकून तो शायद मन में ही हैं !

इसे ढूंडते गलत दिशा में, हम हैं !
प्रतिकूल परिस्तिथियाँ बनाता मन हैं !
अनुकूल होने  पर भी होती ख़ुशी कम हैं !
लेकिन,
मन में हो अगर सुकून तो,
क्लिष्ट, कठिन  और मुश्किल -  नहीं कुछ हैं !
सरल और सहज बन जाए हर काम इस तरह,
की वोह मिटाती हर गम हैं !
और बस जाती मन में,
शांतता और सुकून हैं !
- किरण हेगड़े

7 comments:

  1. बिलकुल,
    सुकून कभी बाहर था ही नहीं, गौर से देखें तो सुकून है यहीं...
    हमारे भीतर.

    सुंदर कविता लिखी है,

    Blasphemous Aesthete

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  2. Beautifully written apart from some spelling errors!;)



    Regards,
    Sapna Hegde

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  3. @Sapna : Thank you!
    Pls let me know I will correct it :)
    thanks again!

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  4. I wish I knew what the words meant. I love your blog theme, very peaceful!

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  5. Wow .. Very beautifully written ... It gives a sense of peacefulness .... You are not only wonderful Engineer ,but also very good Poet ... Good work ...Keep it up ... God Bless you !!!

    Shweta

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  6. Thanks a lot for your encouragement Shweta!!

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