Tuesday, April 30, 2013

Bachpana

एक  बचपना था तभी ऐसे
झुंझला जाते थे छोटी बातों में नजाने क्यू और कैसे  ,
धडकने तेज़ हो जाती और आँखें कपकपाती
मनो लाल रंग कोइला का हो वैसे !

आज हस्ते हैं उन खयालो में ऐसे ,
मुस्कुराते हैं सोच कर नादानीया थी कैसे ,
ज़हन में कुछ बेचैनिय बस जाती थी
वजय का अता पता न होता वैसे !

कुछ समां पते उस वक़्त में हस्ते  हुए ऐसे ,
रह जाती वोह यादें एक चेहेकती हसी जैसे ,
खुद पर हसना इतना मुश्किल भी न था
पर वोह बचपना कहाँ हँसा पता हमे वैसे !

कुछ बदल पाते उन गुज़रे लम्हों को ऐसे ,
उन गुजरे कल में तबदीली होती आज जैसे ,
कुछ तसल्ली और संतोषण शायद ज़यादा होता
पर गुजरे वक़्त के बाद ही ,
      बचपने का एह्सास होता हैं वैसे !!

- Kiran Hegde